सरकार ने यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई को एकीकृत कर ‘विकसित भारत शिक्षा अधिशासन’ के गठन से जुड़ा विधेयक लोकसभा में पेश किया है। नई शिक्षा नीति–2020 के तहत तैयार इस कानून के माध्यम से उच्च शिक्षा का एकीकृत और प्रभावी नियमन सुनिश्चित किया जाएगा। इसके अंतर्गत आईआईटी और आईआईएम भी शामिल किए जाएंगे
देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और ऐतिहासिक सुधार की दिशा में सरकार ने एक अहम पहल की है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) को समाप्त कर उनके स्थान पर एक नई एकीकृत संस्था ‘विकसित भारत शिक्षा अधिशासन (वीबीएसए)’ के गठन का प्रस्ताव किया गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट से स्वीकृति मिलने के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस संबंध में विधेयक लोकसभा में पेश किया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के अनुरूप तैयार इस कानून के लागू होते ही देश की उच्च शिक्षा प्रणाली का पूरा ढांचा नए स्वरूप में सामने आएगा।
सरकार का तर्क है कि वर्तमान में उच्च शिक्षा के लिए अलग-अलग नियामक संस्थाएं होने के कारण नियमों की पुनरावृत्ति, निर्णयों में देरी और भ्रम की स्थिति पैदा होती है। विकसित भारत शिक्षा अधिशासन (वीबीएसए) के गठन से इन समस्याओं का समाधान होगा। इसके बाद विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और शिक्षक शिक्षा संस्थानों का संचालन एक ही समन्वित व्यवस्था के अंतर्गत किया जाएगा।
इस नई व्यवस्था से निर्णय प्रक्रिया तेज होगी, पारदर्शिता बढ़ेगी और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आएगा। खास बात यह है कि पहली बार आईआईटी और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों को भी इस ढांचे में शामिल किया गया है, जो अब तक यूजीसी या एआईसीटीई के सीधे दायरे में नहीं आते थे।
तीन परिषदों का नया ढांचा
प्रस्तावित विधेयक के तहत विकसित भारत शिक्षा अधिशासन के भीतर तीन स्वतंत्र इकाइयों की स्थापना की जाएगी। पहली होगी विकसित भारत शिक्षा विनियमन परिषद, जो नियामक दायित्व निभाएगी। दूसरी विकसित भारत शिक्षा गुणवत्ता परिषद होगी, जो प्रत्यायन और मान्यता से जुड़े कार्यों की देखरेख करेगी। वहीं तीसरी विकसित भारत शिक्षा मानक परिषद गठित की जाएगी, जिसका दायित्व शैक्षणिक मानकों को निर्धारित करना होगा।
इन तीनों परिषदों के बीच समन्वय की जिम्मेदारी विकसित भारत शिक्षा अधिशासन के पास होगी, ताकि विनियमन, गुणवत्ता और मानकों की व्यवस्था एकसाथ सुदृढ़ और प्रभावी बन सके।
सभी संस्थानों पर एक समान नियम
विधेयक के प्रावधानों के अनुसार सभी प्रकार के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों पर नियम एकसमान लागू किए जाएंगे। इसके दायरे में केंद्रीय, राज्य और निजी विश्वविद्यालयों के साथ-साथ ओपन एवं डिस्टेंस लर्निंग, ऑनलाइन तथा डिजिटल शिक्षा संस्थान भी आएंगे। अब तक सामान्य विश्वविद्यालयों का नियमन यूजीसी, तकनीकी संस्थानों का एआईसीटीई और शिक्षक शिक्षा का एनसीटीई करता था, लेकिन अब यह पूरी व्यवस्था एक ही निकाय के अंतर्गत लाई जाएगी, जिससे प्रणाली अधिक सरल और प्रभावी बनेगी।
जुर्माना और सख्त प्रावधान
विकसित भारत शिक्षा अधिशासन के तहत नियमों के उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। नियामक परिषद को अधिनियम या नियमों का उल्लंघन करने पर 10 लाख से लेकर 75 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाने का अधिकार होगा। वहीं बिना अनुमति के शिक्षा संस्थान स्थापित करने पर करोड़ों रुपये तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकेगा, जिससे नियमों का पालन सुनिश्चित हो सके।
जुर्माना और कड़े प्रावधान
वीबीएसए के अंतर्गत नियमों के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की गई है। अधिनियम या निर्धारित नियमों की अवहेलना करने पर नियामक परिषद 10 लाख से लेकर 75 लाख रुपये तक का आर्थिक दंड लगा सकेगी। वहीं बिना अनुमति उच्च शिक्षा संस्थान स्थापित करने पर दो करोड़ रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इसके अलावा, नियामक परिषद को मान्यता प्राप्त उच्च शिक्षा संस्थानों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत डिग्री प्रदान करने से रोकने या उस पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार भी होगा।
अध्यक्षों की नियुक्ति और अधिकार
विकसित भारत शिक्षा अधिशासन और उसकी तीनों परिषदों के अध्यक्षों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। अध्यक्ष का कार्यकाल तीन वर्ष का होगा, जिसे बढ़ाकर पांच वर्ष तक किया जा सकेगा। प्रत्येक परिषद में कुल 14 सदस्य होंगे। अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार की चयन समिति की संस्तुति पर की जाएगी। कर्तव्यों में लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की स्थिति में अध्यक्ष और सदस्यों को हटाने का अधिकार भी निर्धारित किया गया है।
शिक्षा व्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर
सरकार का कहना है कि विकसित भारत शिक्षा अधिशासन लागू होने से उच्च शिक्षा व्यवस्था अधिक मजबूत, जवाबदेह और छात्र-केंद्रित बनेगी। एकीकृत नियामक ढांचा होने से संस्थानों को स्पष्ट दिशा मिलेगी। गुणवत्ता पर विशेष जोर दिया जाएगा और शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की दिशा में ठोस पहल होगी। कुल मिलाकर यह सुधार शिक्षा प्रणाली को विकसित भारत के लक्ष्य की ओर अग्रसर करने में अहम भूमिका निभाएगी


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