गंभीर बीमारियों के इलाज से पल्ला झाड़ रहे अस्पताल
बस्ती के मेडिकल कॉलेज में नहीं है आई.सी.यू
जिला अस्पताल में बस नाम का ट्रामा सेंटर
सरकारी अस्पतालों में रेफर का खेल मरीज और तीमारदार दोनों पर भारी पड़ रहा है। मेडिकल कॉलेज हो या जिला अस्पताल गंभीर मरीजों के इलाज की मुकम्मल व्यवस्था कहीं नहीं है
हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, लीवर, किडनी की गंभीर बीमारी और गंभीर रूप से घायल व्यक्तियों को परिजन बड़ी उम्मीद के साथ इन अस्पतालों में लेकर जाते हैं। मगर निराशा हाथ लगती है।
मेडिकल कॉलेज के ओपेक चिकित्सालय कैली और जिला अस्पताल दोनों जगहों पर इस तरह के मरीजों के पहुंचने पर चिकित्सा व्यवस्था फेल हो जाती है। स्टॉफ से लेकर डॉक्टर तक रेफर करने का खेल शुरू कर देते हैं।
गंभीर स्थिति में मरीज का जैसे ही रेफर पर्चा बनता है, साथ में आए तीमारदार का कलेजा कांप उठता है। अधीर होकर वह यह सोचने पर विवश हो जाते हैं कि आखिर अब कहां ले जाएं अपने मरीज को। लखनऊ- दिल्ली दूर है। इधर मरीज की सांसें अटकी हैं। अब क्या होगा। इस उलझन में तीमारदार की आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है।
यूं कहें कि मरीज की मौत के बाद और तीमारदार की आधी मौत पहले हो जाती है तो गलत न होगा। इस स्थिति में रुपये पैसे होने के बावजूद भी मन टूट जा रहा है। जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है वह निराश हो जाते हैं।
' पहली मजबूरी मरीज को लखनऊ दिल्ली स्थित हायर मेडिकल सेंटर पर कैसे पहुंचाएं।
सरकारी एम्बुलेंस इतनी दूर तक मरीज ले जाने को राजी नहीं होती और प्राइवेट लम्बा चौंडा मुंह खोलते है ।लवख़नऊ तक 8000 रुपये और दिल्ली तक तो 35000 रुपये किराया है।जिनके पास पैसे नहीं वो तो इलाज के पहले पायदान पर ही हार मान बैठते हैं।जब तक धन का इंतजाम करते हैं तब तक मरीज कि जिंदगी से हार जाते हैं।इसके बाद दूसरी मुश्किल है
मरीज को लेकर जाएं भी तो कहाँ जाएँ
लखनऊ मेडिकल कॉलेज, लोहिया, पीजीआई में आसानी से भर्ती होना और बेड मिलना मुश्किल है।
निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च उठा पाना हर किसी के लिए संभव नहीं है। जैसे-तैसे अगर किसी अस्पताल में इंट्री ले ली और तीन चार दिन वेंटीलेटर की जरूरत पड़ गई तो समझो वर्षों की कमाई इसी में चली गई।
कॉर्डियोलॉजिस्ट और - न्यूरोलॉजिस्ट भी उपलब्ध नहीं
जिला अस्पताल और ओपेक चिकित्सालय कैली में कॉर्डियोलॉजिस्ट एवं न्यूरोलॉजिस्ट भी नहीं है, जिससे हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों का इलाज संभव नहीं हो पा रहा है.। तत्काल इलाज की सुविधा न मिलने से कई बार मरीजों की मौत भी हो जाती है।
कुछ चर्चित चेहरों की हार्ट अटैक, के दौरान इलाज की सुविधा न मिलने से मौत हो चुकी है। इस पर विशेषज्ञों की अनुपलब्धता पर आवाज भी उठी पर समय बीतने के साथ भूली बिसरी बातें बनकर रह गई।
केवल 73 एंबुलेंस की सेवा बेहाल जिले में केवल 73 एंबुलेंस की सेवा बहाल है। एडवांस लाइफ सिक्योरिटी वाली केवल चार ही एंबुलेंस हैं। इसके अलावा 102 सेवा की 35 एंबुलेंस हैं। यह सिर्फ महिलाओं और बच्चों और बच्चों के लिए उपयोग में लाई जाती हैं, जबकि 108 सेवा में
34 एंबुलेंस हैं। इन सभी पर एक जिला अस्पताल,दो महिला अस्पताल,मेडिकल कॉलेज और 14 सी.एच सी का प्रभार है।मरीजों की संख्या के सापेक्ष एम्बुलेंस भी कम हैं।
इतनी असुविधाओं के बाद भी जिम्मेदार लगातार चुप्पी साधे बैठे हैं


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